Sunday, November 28, 2021
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कमरतोड़ महँगाई :चीनी की कीमत के अलावे बाकी सभी जींस की कीमतें आसमान छू रहीं.

सन 2010 के पहले चीनी की कीमत ₹14 किलो से बढ़कर के ₹24 पहुंची थी और फिर नाटकीय स्तर पर बढ़कर ₹48 पहुंच गई । उस समय के कृषि मंत्री शरद पवार ने कीमत में अधिक वृद्धि के संकेत भी दिए थे। शरद पवार के इस तरह के बयान से विवाद खड़ा हुआ था।  लेकिन इसके बाद चीनी की कीमत फिर ₹38 पर आ करके , फिर ₹40 ₹44 पर स्थिर हो गई .

मंगाई की मार सबसे ज्यादा पेट्रोलियम पदार्थों पर है और  बाजार में प्लास्टिक की बाल्टी (जो दरअसल पेट्रोलियम प्रोडक्ट है ) से लेकर के कुर्सी और हर छोटे-बड़े सामान की कीमत में महसूस कर सकते हैं

10 वर्षों में पेट्रोल की कीमत ₹45 प्रति लीटर से बढ़कर के ₹105 तक पहुंच गई है। बाजार पर सबसे बुरा असर डीजल की कीमत को लेकर के पड़ा है। डीजल की कीमत जहां पेट्रोल से आधी हुआ करती थी, वह अब ₹95 के करीब रहने लगी है।

सीमेंट और लोहे की कीमत मैं उछाल का भारी असर सन 2010 ईसवी में था। उस समय  सीमेंट ₹150 से बढ़कर ₹300 तक पहुंचा था , अब यह  ₹ 400 से अधिक दर पर है ।  उसने लोहे की कीमत ₹1600 से बढ़कर ₹5200 पहुंची थी।  इसी तरह   ईट ढाई हजार रुपए प्रति हजार से बढ़कर ₹6000 प्रति हजार तक पहुंची थी। सीमेंट के 50 किलो का बैग ₹400 और अधिक दरों पर मिल रहा  है। इसी तरह से  अब पटना महानगर में ईट  की कीमत ₹12000 प्रति हजार है।

तेल और दाल जैसी कीमत और मुख्य खाद्यान्न चावल और गेहूं में भी इस तरह का इजाफा हुआ है कि हर आदमी के प्लेट पर सीधा असर पड़ा है। 

महंगाई के मसले पर सन 2009 और 10 में भी विपक्ष के बीच में गैर जिम्मेदाराना उपेक्षा भावना थी।  अभी उस समय के विपक्ष के सत्ता पक्ष में चले जाने और सत्ता पक्ष के लोगों के विपक्ष में चले जाने के बाद ऐसा ही है । उल्लेखनीय है कि भारतवर्ष में कीमतों में सबसे ज्यादा ओझा उछाल का असर महसूस तो किया गया था सन उन्नीस सौ 1973- 74 में जब छात्रों को मेस के भोजन के लिए अधिक कीमत देना पड़ा था और उन लोगों के द्वारा गुजरात और बिहार में विद्रोह के बिगुल फुके गए थे ।  बढ़ती महंगाई का असर देशव्यापी था और इस वजह से गुजरात के बाद बिहार आंदोलन का भी असर देशव्यापी हुआ।

महंगाई और भ्रष्टाचार यह बड़ी वजह थी, जिस वजह से इंदिरा को तो लोगों ने सत्ता से हटा दिया और इसके बाद बहुत सारे राज्यों में भी कांग्रेस की सरकार चली गई। एक बात देखने में आती थी कि गैर कांग्रेसी शासन के दौरों में पेट्रोल या अन्य पदार्थों की कीमतें नहीं बढ़ाई गई। जनता दल गठबंधन सरकार के समय में भी यह हुआ।  बाद में अटल बिहारी वाजपेई के शासनकाल में भी हुआ। परंतु नरेंद्र मोदी के शासनकाल में ऐसा नहीं देखा जा रहा है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुपात में नहीं बल्कि इसके उल्टा लगातार बढ़ोतरी हुई और अब इन आंकड़ों को बहुत अधिक बताने की जरूरत नहीं है कि सरकार ने जानबूझकर के पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत को घटने नहीं दिया।

महंगाई का मसला सियासत का मसला नहीं बन पा रहा है और इस वजह से शासक दल कीमतों के बढ़ने को लेकर बहुत अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं। बल्कि उलट पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत , जो सरकार के नियंत्रण में होती है, उस में भारी इजाफा किया गया है ।  अभी रसोई गैस का 13 किलो का सिलेंडर ₹1000 की दर से बिकने लगा है।

कीमतों के बारे में राजीव गांधी शासनकाल नरसिंह राव शासनकाल और बाद में मनमोहन सिंह के शासन के दो दौरों के 10 वर्ष चुनौतीपूर्ण रहे थे। मोदी सरकार ने एक तरफ जहां कोविड-19 फेस वन और फेस टू में महीनों तक लगभग 18 करोड़ परिवारों को प्रति व्यक्ति 5 किलो खाद्यान्न मुफ्त दिया है वहीं दूसरी तरफ कच्चा तेल और पेट्रोलियम पदार्थों से अधिक से अधिक टैक्स वसूलने की नीति बनाए रखी है। इसका असर सभी जींस के ऊपर पड़ा है है। रेल यार्ड में इंजन की एक मजबूत होकर का असर मालगाड़ी के डिब्बे के एक सिरे से एक-एक कर पीछे खड़े 25- 50 लोगों पर बारी-बारी से पड़ता है। उसी तरह सरकार अपने उत्पादन- ओं  पैट्रोलियम और सेवा की कीमत बढ़ाकर पूरी अर्थव्यवस्था पर महंगाई का असर ला देती है ।

आगे विरोध की यही स्थिति बनी रही तो, आगे खतरा जो दिखाई दे रहा है —  मार्च 2022 मे पेट्रोल ⛽  150-60 प्रति  ली. की दर पहुँच जायेगा।

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