Sunday, November 28, 2021
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टोक्यो ओलंपिक कुछ दे गया , हमें कुछ कह गया

ओलंपिक 2020 यानी टोक्यो ओलंपिक आज अपने अंतिम दौर में है । आज अंतिम दिन भारत का कोई खिलाड़ी मुकाबले में नहीं है । भारत अपने पूरे परिणाम ला चुका है , इसमें कुछ बढ़ने या घटनेवाला नहीं है । कोरोना काल की तबाहियों और हताशाओं के बावजूद इस बार ओलंपिक खेलों के प्रति भारतीयों में हर बार से ज्यादा रुचि दिखी । समय गुजरने के साथ यह दिलचस्पी बढ़ती गयी । कई खेलों में कई खिलाड़ियों से जो उम्मीद थी , पूरी नहीं हो सकी । कुछ लगभग निश्चित से पदक से वंचित रहने की उदासी से हमें सामना करना पड़ा । खासकर तीरन्दाजी , निशानेबाजी , कुश्ती और उसमें भी महिला कुश्ती में भारत को बड़ी उम्मीदों के बाद भी पदकों के मामले में बड़ी विफलता ही हाथ आयी । महिला हॉकी , गोल्फ , एक दो कुश्ती और मुक्केबाजी के मुकाबलों में बनी उम्मीदें अंतिम क्षण में छिन गयीं । महिला हॉकी का कांस्य मुकाबला हम हार गये , किंतु अपनी महिला खिलाड़ियों के जूझारूपन तथा आखिरी पल तक जान लगा देने के मिजाज ने यकीन जिन्दा रखा ।
नतीजे के तौर भारत ने हर बार से ज्यादा सफलता हासिल की है । पदक विजेताओं में मीराबाई चानू (वेटलिफ्टिंग,रजत), पी वी सिंधु (बैडमिंटन , कांस्य) , लवलीना (बॉक्सिंग,कांस्य) , रवि दहिया (कुश्ती , रजत ) , बजरंग पुनिया (कुश्ती, कांस्य) , नीरज चोपड़ (भालाफेंक,स्वर्ण) और भारतीय हॉकी टीम (कांस्य) रहे । भारत ने पहली बार 7 पदक जीते । एथलेटिक्स में पहली बार कोई पदक , उसमें भी स्वर्ण जीता । गोल्फ में पहली बार कामयाबी के इतने करीब पहुँचे । भारत अपनी गुलामी के दिनों से ,1900 से ओलंपिक में उतरता रहा , लेकिन 2012 के पहले कभी भी 3 पदक से ज्यादा हासिल नहीं कर सका । 2012 में पहली बार भारत ने सबसे ज्यादा छह पदक जीते थे । 2016 में फिर नीचे उतर गये । और इस बार 2012 से एक ज्यादा यानी 7 पदकों पर कब्जा जमाया ।
7 पदकों की खुशी अभी पूरे भारत में देखी जा रही है । यह स्वाभाविक है । एक नया इतिहास रचने की खुशी होनी भी चाहिए । ओलंपिक के मैदान में हर बार से ज्यादा इस बार भारतीय खिलाड़ियों की जाँबाजी दिखने की खुशी अवश्य होनी चाहिए । पदक के सूखे से कुछ उबरने की खुशी भी होनी चाहिए । लेकिन हमें याद रखना चाहिए यह खुशी असल में खुशी नहीं , पूरी खुशी नहीं । यह राहत भर है , दिलासा भर है , थोड़ा आगे बढ़ने का संतोष भर है । अगर हम अन्य देशों के नतीजों से तुलना करें , अगर हम पदक तालिका में भारत का क्रम देखें और अपने देश की आबादी तथा उसमें युवा आबादी का प्रतिशत देखें तो हमें मायूसी ही.मिलेगी । अपने आसपास मैदानों में खेलते कूदते बच्चों और तरुणों की भीड़ हमे यह सोचने को विवश करती है कि यह जवानी तक जारी क्यों नहीं रहती , राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों तक क्यों नहीं पहुँचती । मैदानों लड़कियों की लगभग नाममात्र की उपस्थिति हमें बता जाती है कि हम शायद ही कभी महिला खिलाड़ियों के स्तर पर दूसरे देशों को टक्कर दे पायें । यह भी बताती है कि आज की हमारे देश की महिला खिलाड़ियों की उपलब्धि और जिजीविषा कितनी बड़ी है । महिला हॉकी टीम की एक हार के बाद दलित -विरोधी जातिवादी मानसिकता आयी प्रतिक्रियाएं हासिल अधूरी छोटी मोटी खुशियों को भी दरका जाती हैं । खुद खेलेंगे नहीं और खेलनेवालों को जाति और औरत के नाम पर ताने मारेंगे । पड़ोसियों का यह मानस खेलों का दुश्मन है । 5 अगस्त को मिले हॉकी कांस्य पदक को कश्मीर के 370 धारा हटाने की ऐतिहासिकता से जोड़कर गौरवपूर्ण बताने का प्रधानमंत्री का बयान भी खेल को राजनीति में बेमतलब घसीटने का आपत्तिजनक प्रयास है । यह खेल विरोधी है । इसी तरह अगर कुछ लोग किसी सफल खिलाड़ी के भाजपा या मोदी समर्थक होने के कारण अगर उन्हें अभिनंदन नहीं करना चाहते तो यह भी खेल और देश भावना के खिलाफ है ।
जो देश पदक तालिका में आगे हैं , उन्हें देखकर कुछ सबक हम ले सकते हैं । वे सभी दो में एक पैमाने पर हमसे अवश्य आगे हैं । या तो वहां नागरिकों के बीच सामाजिक समता ज्यादा है, समूह के नाम पर , स्त्री होने के कारण भेदभाव और वर्जना कम है । या तो वहां भेदभाव या पक्षपात के बिना खिलाड़ियों को उनकी क्षमता के अनुसार पूरा अवसर मिलता रहा है और पर्याप्त सुविधाएं मिलती रही हैं । भारत इन दोनों मामलों में बहुत ही बुरे हाल में है । यहां हर स्तर पर तरह तरह के भेदभाव , वर्जना और पक्षपात हावी हैं । ग्रामीण स्तर पर खेल के प्रोत्साहन की कोई नियमित और व्यापक योजना नहीं है । खिलाड़ियों के चयन में और उन्हें अवसर देने में भी पक्षपात होता रहा है । और इन सब से बड़ी समस्या रही है कि खेल प्रशासन बहुत ही केंद्रित और मनमाना है । खिलाड़ियों से ज्यादा सुविधा खेल प्रशासन के लोगों के हिस्से रहता है । खेल प्रशासन पर खिलाड़ियों की हिस्सेदारी नहीं रही है ।
अगर हमें ओलंपिक में सच्ची खुशी हासिल करनी है तो हमारा लक्ष्य अगले एक या दो ओलंपिक की अवधि के भीतर कम से कम पदक तालिका में 10 देशों के बीच आने का लक्ष्य रखना चाहिए । और यह लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब हम अभी से इसके लिए लग जाएँ । गांव गांव में जो तरुण हैं उनमें जो खेल संबंधी नैसर्गिक क्षमताएं हैं , उनकी खोज की मुहिम चलाएं । उन्हें चिन्हित करें और उन्हें उन खेलों में अभी से प्रशिक्षित करने के लिए पर्याप्त साधन और प्रशिक्षण की व्यवस्था करें । जाति ,धर्म और लिंग का भेदभाव और पक्षपात न होने दें । शरीर की मेहनत , तकलीफ सहने की क्षमता ग्रामीणों तथा वंचित समुदायों में ज्यादा है । इस कारण खेल के क्षेत्र में वे ज्यादा आयेंगे , ज्यादा टिकेंगे , ज्यादा जीतेंगे , इस सहज संभावना को समझना चाहिए । वैसे तो जाति , लिंग , धर्म के भेदभाव और दलीय दाँवपेंच की राजनीति कहीं नहीं , जीवन के किसी हिस्से में नहीं होनी चाहिए । लेकिन खासतौर पर खेल के क्षेत्र में तो नहीं ही होनी चाहिए । अगर ऐसा हम कर सके तभी खेलों के क्षेत्र में हम एक विश्व शक्ति के रूप में दर्ज हो सकेंगे । पुराने अतीत के मिथकों के आधार पर विश्वगुरु बनने की कल्पना को छोड़कर हमें खेल में , कला में , शिक्षा में और अन्य क्षेत्रों में विश्व शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प , और योजना बनाने पर ध्यान देना चाहिए ।

मंथन

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