Tuesday, January 25, 2022
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CONGRESS मुक्त भारत अभियान में अब ममता भी शामिल !–अनुभव सिन्हा

विमर्श( पटना) मुस्लिम तुष्टिकरण से बदनाम हुई और इसी वजह से पतन की ओर तेजी से बढ़ रही CONGRESS पार्टी को नेस्तनाबूत करने की मुहिम में ममता बनर्जी भी शामिल हो गई हैं। हालांकि CONGRESS मुक्त भारत का नारा भाजपा का है, लेकिन मुसलमानों के लिए साफ्ट कार्नर रखने वाली ममता बनर्जी का रास्ता भाजपा से जुदा हो सकता है। दिल्ली और कोलकाता में ऐसी इबारत लिखने का माहौल बनाया जा रहा है।

         चार दिनों की दिल्ली यात्रा के दौरान ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिली उन्हें प0बंगाल आने का न्योता दिया लेकिन सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात नहीं हुई। बाकी कई दलों के नेताओं से ममता मिली लेकिन सोनिया से उनकी बातचीत तक नहीं हुई। सियासी गलिायारे में चर्चा जोरों पर है कि TMC का विस्तार करने में लगी ममता की पार्टी को CONGRESS संसद में विपक्ष की जगह नहीं देना चाहती है। 

          इसी साल मई में चुनाव जीतकर तीसरी बार सीएम  बनी TMC प्रमुख के बुलंद हौसलों का कुफ्र CONGRESSपार्टी पर फटने वाला है। टीएमसी की कोशिश इस मामले में देश के विपक्षी दलों के बीच एक राय कायम करने की है। माना यह जा रहा है कि भाजपा की आक्रामक राजनीति और उसके विस्तार के लिए CONGRESS न सिर्फ जिम्मेदार है बल्कि विपक्षी दलों की नेतृत्व क्षमता के अभाव में वह शेष दलों की एकजुटता को हतोत्साहित भी करती है। 

            भाजपा की आक्रामक राजनीतिक शैली का असर देख चुकी ममता बनर्जी इसलिए भी ज्यादा बेचैन हैं क्योंकि लगभग हाशिए पर समझी जाने वाली भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता को कड़ी चुनौती दी थी और उनके मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को एक्सपोज किया था। 

             मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ममता बनर्जी का सबसे धारदार हथियार है। उत्तर भारत की राजनीति में गंगा-जमुनी तहज़ीब को लेकर दिल्ली, यूपी और बिहार में इसके खैरकाह अपनी आवाज ज्यादा बुलंद करते हैं। इसमें कांग्रेस, आप, सपा, राजद, जदयू के अलावा अब एक नाम टीएमसी का भी जुड़ने वाला है। 

हालांकि पश्चिम बंगाल और दिल्ली के अलावा उत्तर-पूर्व राज्यों सहित शेष उत्तर भारत में तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली CONGRESS और क्षेत्रीय दलों को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है, लेकिन इस सियासत की वजह से जो माहौल सामाजिक स्तर पर बनाया जा सकता हो, इस सिलसिले में ममता बनर्जी सतर्क हैं और अपने दिल्ली प्रवास के दौरान शरद पवार, यशवंत सिन्हा यहां तक की सुब्रह्मन्यम स्वामी जैसे वरिष्ठ नेताओं से भी मुलाकात कर बातचीत को आगे बढ़ाने की जुगत में हैं। उनकी कोशिश का यह बिन्दु बेहद दिलचस्प है कि विपक्ष का नेतृत्व उन्हें सौंपा जाए।

          CONGRESS  पार्टी की दुर्दशा से ऐसी चाहत रखने वाले नेताओं की कमीं नही है। सवाल है एकजुटता का जो अपने-अपने हितों की वजह से बिखरा हुआ है। वैसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी को कितनी कामयाबी मिलती है। यह भी दिलचस्प ही कहा जायेगा कि कोई भी चुनाव हो, टारगेट पर भाजपा ही होती है। यह सारी कवायद अगले लोकसभा चुनावों को लेकर बेशक की जा रही है, पर अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों की राजनीति यथावत है।
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