Sunday, November 28, 2021
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विश्व डाक दिवस आजःदिलों का तार जोड़ता है डाक विभाग

विमर्श( डेस्क) किसी जमाने में मशहूर शायर निदा फाजली ने लिखा था ’सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान‘ फाजली ने जब यह शेर लिखा था उस वक्त देश में अपने प्रियजन हों या कोई भी संदेश पहुंचाने का एकमात्र साधन था डाक विभाग ।

आज 9 अक्तूबर है। आज के दिन को दुनिया विश्व डाक दिवस के रूप में मनाती है। आज ही के दिन वर्ष 1874 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन बनाने के लिए स्विट्जरलैंड में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। और 1969 में पहली बार जापान की राजधानी टोकियो में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। भारत 1876 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश बना।

भारतीय डाक प्रणाली का सफर कुछ दिनों का नहीं है। भारत में डाक प्रणाली का सफर हजारों साल का है। अंग्रेजों ने भारतीय डाक को एक नया रूप और रंग दिया, पर अंग्रेजों की डाक प्रणाली उनके सामरिक और व्यापारिक हितों के लिए ही थी। आजादी के बाद स्वतंत्र भारत ने अपनी डाक प्रणाली को ऐसे विकसित किया कि यह आज करोड़ों लोगों के दिलों को जोड़ने का एक जरिया बन गया है।

आज विश्व डाक दिवस पर पूरी दुनिया यह सोचने पर मजबूर है कि भारत में डाक प्रणाली किस तरह देश की सामाजिक और आर्थिक विकास में डाक क्षेत्र के योगदान के बारे में जागरूकता पैदा करने का का उपक्रम बन गया है।

जरा याद करिए जब हमारे गांव में , कस्बे में या शहर के मुहल्लों में साइकिल पर सवार घंटी बजाते डाकिया आता था तब सबके चेहरे खिल जाते थे। हर कोई डाकिया से जरूर पुछता आज मेरे लिए भी कुछ लाए हो क्या। हर कोई इस उम्मीद में रहता था कि डाकिया आज जरूर कोी चिठ्ठी या संदेश मुझे भी देगा। डाकिए के थैले में से निकलने वाली चिट्ठी किसी को खुशी का तो किसी को गम का संदेश दे जाती थी। पहले तो लोग डाकिए से दूसरे की चिठ्ठी भी ले लेते थे और जाकर खुद पहुंचाते थे। गांवों में तो कम पढ़े लिखे लोग थे , सो चिठ्टी लाने वाली ही उसे पढ़कर सुनाता था और फिर जो संदेश देना है उसे बोलकर लिखवाने की भी परंपरा थी। यह सब काम डाकिया ही करता था।

गांवों में तो चिट्ठी पढने-लिखने वाले बच्चों को इनाम में कुछ पैसा या खाने को गुड़, बताशे भी मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा घरों में चिट्ठियां पहुंचाने का प्रयास करते थे। एक जमाना था जब गांवों में बैंक नहीं थे। लोग मनीऑर्डर से पैसे भेजते थे। मनी ऑर्डर लेकर डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता था, व भुगतान के वक्त एक गवाह के भी हस्ताक्षर करवाता था।

उस जमाने में बेहद जरूरी संदेश तार के जरिए भेजे जाते थे। तार वाले संदेश महंगे होते थे इसलिए बेहद संक्षिप्त संदेश होते थे। चूंकि लोग पढ़ना नहीं जानते थे इसलिए कई बार तो तार द्वारा संदेश आते ही घर में रोना धोना शुरू हो जाता था। बाद में संक्षिप्त संदेश का अर्थ समझने पर लोग सहज होते थे।


पहले पत्रकारिता में भी जरूरी खबरे तार द्वारा भेजी जाती थी, जिनका भुगतान समाचार प्राप्तकर्ता समाचार पत्रों द्वारा किया जाता था। इस बाबत समाचार पत्र का सम्पादक जिलों में कार्यरत अपने संवाददाताओं को डाक विभाग से जारी एक अधिकार पत्र देता था। जिनके माध्यम से संवाददाता अपने समाचार पत्र को बिना भुगतान किए डाकघर से तार भेजने के लिए अधिकृत होता था। 15 जुलाई 2013 से सरकार ने तार सेवा को बंद कर दिया।


आज नजारा बदल गया है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को बहुत कम कर दिया है। आज लोगों ने हाथों से चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया है। अब ई-मेल, वाट्सएप  के माध्यमों से मिनटो में लोगो में संदेशों का आदान प्रदान होने लगा है। लेकिन डाक विभाग के अमूल्य योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। आज भी फिल्मों में डाकिया,डाक और चिठ्ठियों पर ना जाने कितनी कहानियां लिखी जाती हैं, फिल्में बनती हैं। चिठ्ठियों पर तो सैकड़ों गाना बने हैं जिन्हें सुनकर हर किसी का दिल मचल जाता है।

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